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२०९ ॥ श्री कुरबान शाह जी ॥

जारी........

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी बिधि गति मिटिया जी।

राम के बांये लखन के दहिने, राजैं जनक बिटेऊ जी।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी छबि लखि लेऊ जी।

राम के बांये, लखन के दहिने, राजत जनक की लड़की जी।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी लखि भव तड़की जी।५४।

राम के बांये, लखन के दहिने, पुत्री लखौ सुनैना की।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी के उर अयना जी।

राम के बांये, लखन के दहिने, अद्भुत भूमि सुता बैठीं।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी सब उर हैं पैठीं।

राम के बांये, लखन के दहिने, कौशिल्या की बैठि बहू।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी नित प्रति लखत रहूँ।६०।

राम के बांये, लखन के दहिने, बैठि पतोहू दशरथ की।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी लखि सब समरथ की।

राम के बांये, लखन के दहिने, बैठीं लव कुश की मैया।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी लखि लखि सुख पैया।

राम के बांये, लखन के दहिने, बैठीं जनक केर मिश्री।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी लखि सुधि बुधि बिसरी।६६।

राम के बांये, लखन के दहिने, झाँकी श्री जनक धिय की।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी उघरैं लखि हिये की।

राम के बांये, लखन के दहिने, भरत शत्रुहन की भाभी।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी सब के हित फाभी।

राम के बांये, लखन के दहिने, झाँकी श्री भूमिजा की।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी चरन चूमि छाकी।७२।

राम के बांये, लखन के दहिने, झाँकी श्री महिजा जी की।

ध्यान सकल कल्याण का दाता, तुलसी लखु सहजा जी की।७४।


दोहा:-

परमेश्वर के भजन बिन, मिलै न कबहुँ शान्ति।

कुरबान शाह कह हर समय घेरे रहती भ्रान्ति॥

दाया पापिन पर करै, भक्तन पर हरि प्रेम।

धन्य धन्य वे जीव हैं, जे सुमिरैं नित नेम॥

झूठा अपना मतलबी औ दरिद्र कंजूस।

साधक इनका संग करै तो होवै बनहूस॥

इनकी संगत जो करै अन्त में नरकै जाय।

नाना भाँति के कष्ट तहँ रोये नहीं सेराय।४।

साधक इनसे अलग हो तब होवै कल्याण।

कुरबान शाह कह मानिये, सुर मुनि कीन बखान।

तपधन जाहिर मत करो, या से होती हानि।

कहैं शाह कुरबान सब, सुर मुनि की यह बानि॥

चोर चूहरी लूट लें रहै न तप कछु पास।

पहुँच सकौ नहि निज वतन करैं दोऊ दिसि नास॥

शान्ति दीनता लेहु गहि, सतगुरु बचन को मान।

तब दोनो दिसि जाय बनि, कहैं शाह कुरबान।८।