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२४१ ॥ श्री अंधे शाह जी ॥(२५८)


पद:-

कथा सुनाना सुनना भक्तौं हवन प्रार्थना का करना।

ध्यान प्रकास समाधि नाम धुनि रूप सामने भा तरना।

अंधे कहैं जीति लो मन को सतगुरु करि चरनन परना।

यही उपाय देव मुनि जुग जुग बार बार सब हित वरना।४।