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८०९ ॥ श्री जगई जी ॥


पद:-

राधे जी का अनूप बनरा।

मोर मुकुट कानन में कुण्डल केशरि तिलक भाल दृग कजरा।

भूषण बसन जड़ाऊ पहिने कर मुरली फूलन गले गजरा।

नूपुर छम छम छम छम बाजैं नाचत झुकत झूमि हंसि कहरा।

चितवनि अजब गज़ब करि डारै तन मन में टिकै प्रेम क पहरा।५।

सका सखी राधे संग नाचत अम्बर फहर फहर रहे फहरा।

नाना साज़ बजैं को बरनै त्रिबिधि समीर के आवत लहरा।

जगई कहैं करो जब सतगुरु तब अज्ञान क उलटे सेहरा।८।