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७३३ ॥ श्री न्यामत शाह जी ॥


पद:-

भजन हरि का नहीं करते दोष कलियुग को देते हैं।

दया निधि नाम है हरि का वो जल ही सम पिघलते हैं।

जगत की बातों के मुन्शी बका दिन रात करते हैं।

कथा औ कीर्तन लखि करके उनके दिल धड़कते हैं।

बुरी संगति क यह फल है चोर नित तन के ठगते हैं।५।

ढूंढ सतगुरु को जो भाई ठीक मारग पै परते हैं।

रमा औ बिष्णु की झांकी सदा सन्मुख में लखते हैं।

ध्यान धुनि नूर लय पाकर एक रस मस्त रहते हैं।

वही पण्डित वही ज्ञानी वही योगी न मरते हैं।

बड़ा इन्साफ़ वँह ठाना खरा खोंटा परखते हैं।१०।

होय जो जीव जेहि लायक उसी दरजे पै करते हैं।

प्रेम तन मन से जे करते जियत भव सिन्धु तरते हैं।

सदा निर्वैर औ निर्भय परै बैठै बिचरते हैं।

देव मुनि संग बैठक हो लखै लीला जो करते हैं।

पाठ पूजा करैं कितने बहुत चुप ध्यान धरते हैं।

कीरतन कर रहै कोई निआमत शाह कहते हैं।१६।