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३४१ ॥ श्री अड़बड़ शाह जी ॥

पद:-

करो सतगुरु भजन जानो होय भव सिन्धु से तरना।

ध्यान धुनि नूर लय जाओ होत जहँ कर्म दोउ जरना।

मिलैं सुर मुनि सुनौ अनहद पिऔ अमृत झरै झरना।

सामने राम सीता औ श्याम श्यामा कि छबि करना।

प्रेम में चूर तन मन से तभी हो जियति में मरना।

कहैं अड़ बड़ त्यागि तन फिर न हो पग गर्भ में धरना।६।