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२८६ ॥ श्री राधा लोहारिन जी ॥

तिथि: १०.२.७४ 

वार्तिक:-

राधा लोहारिन काशी बासी शंकर जी को नेम से सिर्फ नहाकर जल चढ़ाती थी। एक दिन शंकर जी प्रगट हो गये। कहा 'माँग क्या चाहती है।' तो उसने कहा 'कृष्ण भगवान की भक्ती' । तो कहा 'रैदास जी रामानन्द जी के शिष्य कृष्ण भक्त हैं। धर्मराज के अंश हैं। उनसे दीक्षा लो। तुझे सब प्राप्त हो जायगा।' तब मैं रैदास जी के पास गई, दण्डवति किया और शंकर जी का हाल बताया। रैदास जी ने दीक्षा दी। जप शुरु कर दिया। शंकर जी को जल नेम से चढ़ाती रही। दो माह बाद हमारे पट खुल गये। नाम की प्राप्ति, रूप की प्राप्ति, परकाश की, लय की, शून्य समाधि की, सब देवता-सिद्ध संत दर्शन देने लगे। हर शै से महामंत्र र रंकार की धुनि होने लगी, शुभ लोकों से तार आने लगे, देवताओं के गृह दिब्य भोजन को जाने लगी, कुण्डलिनी जग गई, छइउ चक्कर चलने लगे, सातौं कमल खिल गये, भाँति भाँति की सुगंध दोनों स्वरन से आने लगी अनहद बाजा बजने लगे, घट में अमृत का पान होने लगा। फिर शंकर जी प्रगट होकर हृदय से लगा लिया और पारवती जी ने दिब्य भोजन दिया और शंकर जी पारबती जी ने एक एक हाथ पकड़ कर अजर अमर कर दिया। बहुत विस्तार है थोड़ा लिखा है।