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॥ अथ जय माल वर्णन॥

 

जारी........

तख्त पर दीन तहाँ पौढ़ाय। पहुँचिगे सभा में सब फिर जाय॥

बजे ग्यारह रावन उठि जाय। गये सब अपने गृह सुभटाय॥

बिभीषण उठि कै गृह में जाय। कहै माता से हाल सुनाय।२८१०।

 

कहैं माता तुमरो बड़ भाय। पिता तुल्य शास्त्र बतलाय॥

शोच मत कीजै तन दुख पाय। भजन में मन नहिं लागै आय॥

भक्त हरि के कहवाय के हाय। परिक्षा तनिक में गयो डेराय॥

हमै अब मालुम ह्वै गो आय। भक्त तुम कच्चे मम पुत्राय॥

मान अपमान को डर जहँ आय। ग्रन्थि नहिं सुरझी अरुझत जाय।२८२०।

 

जाव हरि के ढिग दुःख नशाय। देर काहे तुम रहेव लगाय॥

ध्यान सुर मुनि करते चित लाय। देत हरि दर्शन तब कहुँ जाय॥

आयगे साक्षात सुखदाय। उधारन अधमन को हर्षाय॥

भाग्य हम सब की खुलिगै आय। नैन भरि देखैं सिय रघुराय॥

मातु के बचन सुनैं सुखदाय। बिभीषण चलैं चरण शिर नाय।२८३०।

 

पहुँचिगे अशोक बाटिक जाय। मातु के चरण परैं शिर नाय॥

कहैं सब आपन चरित सुनाय। दृगन दोउ आँसू टपकत जाँय॥

मातु ने कह्यौ सुनौ भक्ताय। करैं इच्छा पूरन रघुराय॥

राज्य तुमको देहैं सुखदाय। शरनि जहँ गयो तिलक ह्वै जाय॥

बिभीषण चरनन में परि जाँय। चलैं तन मन ते अति हर्षाय।२८४०।

 

पहुँचि जाँय उदधि पास में आय। करैं अस्नान हर्ष हिय छाय॥

जाँय जब कटक निकट नियराय। लखैं हनुमान निकट चलि जाँय॥

मिलैं दोउ प्रेम प्रीत ते धाय। कहैं हनुमान कहाँ तुम आय॥

कीन किरपा अतिशय सुखदाय। हाल सब आपन देव बताय॥

देंय सब चरित ठीक बतलाय। सुनैं हनुमान शान्त चित लाय।२८५०।

 

कहैं हनुमान सुनो मम भाय। आप की पुण्य़ उदय भइ आय॥

लखन ते कहैं पवन सुत जाय। बिभीषण आये प्रभु शरनाय॥

बैठ हैं थोड़ी दूर पै आय। हुकुम होवै तो लावैं जाय॥

सभा के मध्य में रावण राय। लात उर मारय्यौ गिर गे भाय॥

चारि निश्चरन ते कह्यौ सुनाय। धरौ या को गृह के दर जाय।२८६०।

 

चेत जब या के तन ह्वै जाय। कह्यौ मम पुरी से हट ये जाय॥

सामने कभी ने मेरे आय। नहीं तो जान से देंव मराय॥

सुनैं यह बचन लखन मन लाय। कह्यौ जाय प्रभु से बचनाय॥

सुनत ही हरि नैनन जल आय। कहैं लछिमन ते लाओ जाय॥

चलैं श्री लखन पवन सुत धाय। पहुँचिगे निकट कहौं का भाय।२८७०।

 

लखन को लपटि बिभीषण धाय। मिले उर में उर प्रेम से लाय॥

लखन हंसि कहैं बिभीषण भाय। बुलायो आपको प्रभु सुखदाय॥

भयो सब सुर मुनि आय सहाय। रहैगी कीरति तब जग छाय॥

बिभीषण चलैं संग हर्षाय। नाम हरि का सुमिरत चित लाय॥

लखन आगे पीछे मरुताय। बिभीषण मध्य में चलते भाय।२८८०।

 

निकट हरि के जब पहुँचैं जाय। खड़े प्रभु भे नैनन जल छाय॥

बिभीषण साष्टाँग परि जाँय। उठाय के प्रभु उर लेंय लगाय॥

पकरि कर बैठारें सुखदाय। बिभीषण छबि में जाँय लुभाय॥

पूछते प्रभु सब हैं कुशलाय। प्रेम वश बोलि न पावैं भाय॥

दहिन कर शिर फेरैं सुखदाय। मिटै आवेश होश ह्वै जाय।२८९०।

 

बिभीषण चरित कहैं सब गाय। जौन कछु कीन्ह्यौ रावण राय॥

कह्यौ हरि निर्भय ह्वै अब भाय। राज्य लंका कि करिहौ जाय॥

रहौ मम संग यहाँ सुख पाय। बधौं सब सेना रावण राय॥

दहिन कर हरि ने दीन उठाय। खड़े हो कहैं सुनो सब आय॥

बिभीषण के शिर तिलक लगाय। बनावैं लंक पुरी को राय।२९००।

जारी........