गुरु परम्परा | Rammangaldasji

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गुरु वंदना

श्री गुरु महिमा को कहै, अति ही ऊँच मुकाम।
ताते गुरु पद को करौं बार बार परनाम॥

यह गुरु महिमा का पद भगवान श्री रामचन्द्र जी ने स्वयं प्रकट होकर श्री महाराज जी को लिखवाया है।

गुरु परम्परा

श्री परमहंस राममंगलदास जी की गुरु परम्परा का समारम्भ आदि गुरु स्वामी रामानन्द जी से होता है।
श्री स्वामी रामानन्द जी श्री भरत जी के अंश थे जो स्वयं श्री विष्णु भगवान के अवतार थे।

आदि गुरु स्वामी रामानन्द जी के बारह प्रमुख शिष्य थे जो द्वादश महाभागवत के नाम से जाने जाते थे :-

1.         श्री अनन्तानन्द जी ब्रह्मा जी का अवतार
2. श्री सुखानन्द जी शंकर जी का अवतार
3. श्री योगानन्द जी कपिल देव जी का अवतार
4. श्री सुरसुरानन्द जी नारद देव जी का अवतार
5. श्री गालवानन्द जी शुकदेव जी का अवतार
6. श्री नरहरियानन्द जी सनतकुमार जी का अवतार
7. श्री भावानन्द जी जनक जी का अवतार
8. श्री कबीरदास जी प्रह्लाद जी का अवतार
9. श्री पीपा जी राजा मनु जी का अवतार
10. श्री रैदास जी धर्मराज जी का अवतार
11. श्री धन्ना जाट जी राजा बलि जी का अवतार
12. श्री सेन भक्त जी भीष्म जी का अवतार

 

श्री परमहंस राममंगलदास जी की गुरु परम्परा निम्नानुसार है :

1. आदि गुरु स्वामी रामानन्द जी भरत जी का अंश
2. उनके शिष्य स्वामी भावानन्द जी जनक जी का अवतार
3. उनके शिष्य स्वामी बृजानन्द जी
4. उनके शिष्य स्वामी बालानन्द जी
5. उनके शिष्य स्वामी बिठलानन्द जी
6. उनके शिष्य स्वामी बल्लभानन्द जी
7. उनके शिष्य स्वामी ब्रह्मानन्द जी
8. उनके शिष्य स्वामी मानदास जी
9. उनके शिष्य स्वामी मन्सा राम जी
10. उनके शिष्य स्वामी रघुनाथ दास जी
11. उनके शिष्य स्वामी राम चरण दास जी
12. उनके शिष्य स्वामी बलदेव दास जी
13. उनके शिष्य स्वामी रघुनाथ दास जी
14. उनके शिष्य स्वामी जगन्नाथ दास जी
15. उनके शिष्य स्वामी बेनी माधव दास जी गुरु नानक जी का अंश। (गुरु नानक जी श्री जनक जी का अंश थे)
16. उनके शिष्य स्वामी राममंगलदास जी हमारे गुरुदेव जी

 

श्री महाराज जी ने अपनी पुस्तक 'भक्त भगवन्त चरितावली एवं चरितामृत' के "दो शब्द" में लिखा है, कुछ समय हुआ भगौती (माँ भगवती) का हुक्म हुआ कि कुछ भक्तौं की कथाएँ लिख दो। अवस्था ८२ की हो गई है, शरीर कमजोर है पर भगौती का हुक्म तो धीरे अभी तक ३०० से ऊपर कथाएँ लिखी हैं। पहिले इनमें से २०० छपैंगी, फिर भगवान की जैसी इच्छा होगी।

जो बातें स्वयं श्री भगवान, देवी देवताओं व संतों ने श्री महाराज जी के बारे में इन चार दिव्य ग्रन्थों में कही हैं तथा उपरोक्त भक्तो की कथाओं में लिखी हैं, जो मैं (प्रकाशक) अपनी निपट बुद्धि से जान सका, वे ही बातें उन्हीं की कृपा से नीचे लिख रहा हूँ।

जगदीशपुरी धाम की यात्रा के वर्णन में श्री महाराज जी ने लिखा है - "जब गौरांग जी के मंदिर में गये जहाँ वह छै भुजा से विराजमान हैं तो लम्बी दंडवति करने का विचार किया तो बड़ा प्रकाश हुआ। मालूम हुआ कि सारा संसार प्रकाशमान है। फिर लय दशा हो गई। ज्ञान, ध्यान, भान भूल गया। सीधा काठ ऐसा शरीर खड़ा रहा। तब भगवान ने अपना दाहिना चरण हमारी छाती पर लगाया। हम होश में आ गये। हमने चरण को माथे में लगा कर छोड़ दिया। वहाँ पर कबीर जी, मलूक साहेब, कर्मा माई, हरी दास, नित्यानन्द जी, रघुनाथ, अद्वैताचार्य और श्री बास के दर्शन हुये। सबने कहा, ''महाराज, कृष्णावतार का यह सखा आप का सुखदेव है।" भगवान मुस्करा दिये। हमारे आँसुओं की धारा चलने लगी। वै प्रेम के आँसू बर्फ जैसे ठंडे होते हैं। यह प्रेम की नदी से बहते हैं। दुख की नदी के आँसू गरम होते हैं। दो नदी आँखों में हैं।"

पुनः, बूढ़ी माता, हुसेन गंज, लखनऊ, की कथा में बूढ़ी माता ने श्री महाराज जी का हाल द्वापर का बताया था। उनसे कृष्ण भगवान ने कहा,"यह हमारा सखा सुखदेव ग्वाल है हर समय संग नाचता, गाता था और दूध लूटने में संग रहता था"।

गुरु परम्परा का विस्तार जानने के जिज्ञासु कृपया जो ग्रन्थ प्रत्येक के विषय में उपलब्ध हों उनका अध्ययन करें। यह वेबसाईट हमारे परमपूज्य गुरु संत शिरोमणि अनन्तश्री परमहंस राममंगलदास जी से सम्बन्धित विषयों तक ही सीमित है।