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२५५ ॥ श्री झँडूले शाह जी ॥


पद:-

लोक तीर्थ व्रत देश ग्राम गीता मानस के पग धरते।

बेद शास्त्र उपनिषद संहिता औ पुराण स्तुति करते।

सुर मुनि आरति साज उतारैं प्रेम से नैन नीर झरते।

श्री माता श्री माता कहि कहि मुर्च्छित ह्वै मही पर गिरते।

होश में आय उठैं हर्षित ह्वै तन मन रूप कि छवि भरते।५।

सतगुरु करैं लखैं ते कौतुक उनके सारे दुख टरते।

ध्यान धुनी परकाश दशा लय पाया जयति जग से तरते।

सिया राम प्रिय श्याम सामने हर दम निज झाँकी ठरते।८।


दोहा:-

शान्ति दीनता लेय गहि, निज को देय मिटाय।

सतगुरु कर सुमिरन करै सो यह मारग पाय॥