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१५६ ॥ श्री लाला देवी सहाय जी ॥


पद:-

हरि हम चोरन से किमि छूटैं।

हैं अति कठिन रहत सँग ही में घात लगाय के लूटैं।

ऐसा मेल किहे आपस में नेक होत नहिं फूटैं।

मन भी इनके सँग मिला है या से बांधिन जूटैं।

अधरम इनका जल औ भोजन हर दम लारी घूटैं।

सतगुरु देहु मिलाय दयानिधि इन्हैं पकरि हम कूटैं।६।