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१७ ॥ श्री ग्वाल्हा माई जी ॥


पद:-

जो हरि पर तन मन वारी ग्वइयाँ। सो सन्मुख रूप निहारी ग्वइयाँ।२।

लै ध्यान धुनी उजियारी ग्वइयाँ। जियतै में हो भव पारी ग्वइयाँ।४।

बिन सुमिरन हो दुख भारी ग्वइयाँ। बोलो सतगुरु की बलिहारी ग्वइयाँ।६।

जिन दीन्हों भेद करारी ग्वइयाँ। कहैं ग्वाल्हा पे दैकर तारी ग्वइयाँ।८।