साईट में खोजें

५०१ ॥ श्री शिकारी शाह जी अपढ़ मुसलमान॥

(१ जुलाई सन् १९८१ को रात्रि २ बजे आये थे)

चौपाई:-

खान पान में जाको प्रेम। उसका झूठा नेम औ टेम।१।

पांचो चोर औ पकड़े मेम। कैसे होवै वाको छेम।२।

 

चौपाई:-

बंचक भक्त कथा हैं बांचत। मन औ चोर अजा संग नाचत।३।

शान्ति दीनता सच्ची जुगती। तब मिल जाती मुक्ती भक्ती।४।

पाप का बाप लोभ दुखदाई। अंत समय नरकै लै जाई।५।

 

चौपाई:-

मान अभिमान न जाको लागै। सो तन तजि हरि पुर को भागै॥

मन काबू जाको ह्वै जावै। सोई सच्चा भक्त कहावै॥

मन साधू जब तक नहीं तन साधू बेकार।

मन साधू जब ह्वै गयो दोनों दिशि जैकार।

बिन धीरज नर भटकत घूमै। छिन छिन में माया मुख चूमै।५।

 

बार्तिक:-

शिकारी शाह उसे कहते हैं जिसे नाम की प्राप्ती - सरूप की प्राप्ति - प्रकाश की प्राप्ती - लय दशा की प्राप्ती - शून्य समाधि की प्राप्ती - सहज समाधि की प्राप्ती - प्रेम समाधि की प्राप्ती - अनहद बाजा की प्राप्ती - अमृत पान की प्राप्ती - शुभ लोकों में कुण्डलिनी शक्ति के साथ घूम आना - सातौं कमल खिल जाना - नासिका से सुगंधि आना - छइउ चक्र चलने लगना - सब देवी देवताओं के दर्शन होना - देवी देवताओं के यहां दिव्य भोजन का खान पान होना - भूख प्यास का शान्ति हो जाना - जाड़ा घाम का छूट जाना - अजर अमर ह्वै शरीर बारह वर्ष का हो जाय - बड़ा बिस्तार है कहां तक लिखावैं। वही जीव जियतै शरन हो गया - वही तरन हो गया - वही मरन हो गया। जैसे सेंका अन्न जैसे फिर नहीं जमता।